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सफलता में धैर्य का महत्व

                                   

                                  सफलता में धैर्य का महत्व

                                   (कबीर साहब के शब्दों में )

        
                  मित्रों ,आप सभी को अपने जीवन में धैर्य (धीरज रखना ) का महत्व ज्ञात है। धैर्य अपने आप में बहुत व्यापक शब्द हैं। आज हम सफलता में धैर्य का महत्व के विषय पर कबीर साहब द्वारा कहे गए एक दोहे की व्याख्या करेंगे। 
               धैर्य की परिभाष :-धैर्य उस क्रियाशीलता को कहते है जिसमे परिणाम की चिंता नही की जा रही हो।                                     
                दोहा :-                              धीरे-धीरे रे मना ,कारज धीरे होय                                                                                                              माली सीचे सौ घड़ा ,समय पाय फल होय।। 

                शब्दार्थ  :-   रे मना -  (मेरे मन) ,कारज -(कार्य ), धीरे होय -(धीरे होना ) , माली -(फूल-पौधा उगने वाले विशेष व्यक्ति ),सींचे- (फूल-पौधो में पानी देना ), घड़ा -(मिट्टी का बना बर्तन ,जिसमें पानी भरते है ),समय पाय -(अनुकूल समय पर ,उचित समय पर )                                                                                                                           

           दोहे का अर्थ -कबीर साहब इस दोहे के माध्यम से अपने मन को समझते हुए प्रवचन करते हैं " रे मेरे मन थोड़ा धैर्य रख, किसी भी कार्य का परिणाम उसके समय आने पर मिलता है। पौधे में माली अगर सौ घड़ा पानी भी डालें तो भी वह पौधा अपने अनुकूल समय आने पर ही फल देगा"।    


              
                   मित्रों ,पिछले ब्लॉग में हमने सफलता (कबीर साहब के शब्दों में ) पर चर्चा किया। अब हम यह जानेंगे कि हम में से ज्यादातर लोग जो सफल होते हैं उनकी सफलता में धैर्य का कितना योगदान होता हैं? कबीर साहब ने इस दोहे के माध्यम से स्वयं के मन के उद्वेग को थामने का प्रयास करते हुए स्वयं को ही समझते है। ऐसे ही हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी स्थिति आती है जब हम किसी कठिन कार्य को कर रहे होते है और कार्य की समय सीमा में हमे परिणाम नही मिलता है ,उस समय हमारा मस्तिष्क धैर्य खोने लगता है तथा मन परिणाम ढूढ़ने में लग जाता है, तब विचार आता है कि आखिर परिणाम क्यों नही आ रहा है। उस समय पर जो भी व्यक्ति धैर्य से काम लेता है और कबीर साहब की तरह अपने मन को समझा लेता है ,वह सफल हो जाता है। 
              एक बार की बात है हमारे गाँव में एक पशुपति नाम का आदमी आया ,वैसे देखने में तो ठीक-ठाक दिखता था पर दिमाग से थोडा कमजोर था। उस समय हमारे घर पर एक काम करने वाले आदमी की आवश्यक्ता थी, इसलिए पिता जी ने उसे काम पर रख लिया। पशुपति को हमारे यहाँ काम करते हुए लगभग छः महीने बीत चुके थे। पशुपति हमारे घर के सभी काम-काज ठीक ढंग से संभाल रहा था,उसी बीच घर के पीछे वाले बाग में बहुत आम लगे थे ,आम तोड़े गए। पिता जी ने कुछ बीस आम पशुपति को भी दिए और कहा "पशुपति इसे ले जाकर भूसे में दबा दे ,पक जाने पर निकालकर खा लेना। पशुपति बहुत खुसी के साथ आम हाथ में लिया और ले जाकर भूसे में दबा दिया, जिस दिन से पशुपति को आम मिल गए उसका एक काम विशेष रूप से बढ़ गया। पशुपति अब रोज दिन में चार-पाँच बार भागते हुए भूसा वाले घर में जाता, आम टटोलता और देखता की आम पके या नही पके। घर में रखा सारा आम पक गया और हम सभी लोग खाए पर पशुपति का आम नही पका।                                                               
                 एक दिन हम लोगों ने देखा कि पशुपति कुछ कच्चे और ख़राब आम लिए फेंकने जा रहा है ,तब चाचा जी ने हम लोगों से बताया कि" पशुपति को जब से आम दिया गया था तब से वह आम को दिन-दोपहर,शाम-रात हर समय टटोलता रहता था इसलिए आम नही पक पाए, उसे धैर्य ही नही था,अगर वह आम को चार दिन के लिया भूसे में दबाकर छोड़ देता तो आम पक जाते "
            
           इस कहानी में आप ने देखा कि धैर्य न होने के कारण पशुपति आम पकने में भी असफल हो गया जब कि उसे आम पकने के लिए धैर्य रखने के अलावाँ कुछ भी नही करना था।             
             मित्रों ,इसी प्रकार आपने देखा होगा कि हमारे आसपास काम करने वाले कम समझदार लोग रोज मजदूरी करते हैं और रोज अपना वेतन जोड़ कर ले लेते हैं उसमे से कुछ तो मजबूर होते हैं पर जिनकी कोई जरुरत नही होती है वह भी ऐसा करने के आदती होते है, उन्हें अपने परिणाम की ज्यादा चिंता होती है। उनमें धैर्य नहीं होता। वहीं आप ने बड़े-बड़े वैज्ञानिको के बारे में सुना होगा कि वह बिना परिणाम की चिंता किए वर्षो शोध कार्य में लगे रहते हैं और बड़ी सफलता हासिल करते हैं, अर्थात " जितना बड़ा धैर्य उतनी बड़ी सफलता " 
                                                                                                                                               
                                                                                                                                              क्रमशः ....  
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    मृत्युंजय  

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