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क्या खोया -क्या पाया-3

                                                             क्या खोया -क्या पाया -3                                               मित्रों ,आशा करता हूँ कि आपने " क्या खोया -क्या पाया-2" पढ़ा होगा। हम कबीर साहब के एक दोहें "चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय। दुई पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय" पर चर्चा कर रहे थे।इस दोहे पर आप जब ध्यान दे तो समझ जायगे कि कुछ सामान्य सी बात हो रही परन्तु कबीर साहब की पक्तियाँ अपने में ढेरों भाव समेटे रहती है। इस दोहे के माध्यम से कबीर साहब कहते हैं कि मनुष्य का जीवन जो हम सबको इस धरा पर मिला है वह एक चक्की में समाहित होने के समान है ,उस चक्की का एक पाट यह धरती और दूसरा पाट यह आकाश है , यह चक्की अनवरत चल रही है अर्थात यह चक्की समय के साथ-साथ बिना रुके ...