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क्या खोया -क्या पाया -2

                                                             क्या खोया -क्या पाया -2                                                                                                                                                                                                                                                    मित्रों,आशा है कि आप ने "क्या खोया -क्या पाया-1" पढ़ा होगा।श्री कबीर साहब की पँक्ति "बे दाग चुनरियाँ छोड़ गए" की व्याख्या कर रहे थे। मित्रों, श्री कबीर साहब को जीवन का इतना कटु और बारिक़ अनुभव था कि उन्होंने जो बात कही, उसका बहुत ही व्यापक अर्थ है। आप विचार करें तो ज्ञात होगा कि श्री कबीर साहब के द्वारा कहे गए शब्द उनके समय में ही नही ,आज के समय में भी और आने वाले समय में भी सदैव एक समान प्रसांगिक रहेंगे।                                                                                                                                                      मित्रों "बे दाग चुनरियाँ छोड़ गए" श्री कबीर साहब ने अपने जीवन के अंतिम समय में कहा था,जब उन्होंने लगभग जीवन के प्रमुख क्रियाशीलता के दिन समाप्त कर लिए थे अर्थात जब उनके जवानी के दिन थे तब उन्होंने अपना सम्पूर्ण समय और सामर्थ, सयंम और साधना में बिता दिया पर जब हाथ-पैर ,मन-मस्तिष्क ,में शिथिलता आने लगी, जब यह महशुस हो गया कि जो काया रूपी चुनरियाँ आत्मा ने ओढ़ी है , जिस शरीर रूपी चुनरियाँ के द्वारा पाने-खोने ,लेने-देने ,हानि-लाभ ,नफ़ा-नुकसान आदि करते थे ,जिसमे दाग़ लगने की संभावना थी, वह अब उतारने का समय आ गया, तब उन्होंने यह बात कही। मित्रों, हम सब का जीवन अलग-अलग है ,सभी की स्थिति-परिस्थिति अलग-अलग हैं एवं बहुत सी असमानताए हम सब में हैं ,ढेरों असमानताओं के होते हुए भी हम सभी में अनेकों समानताएं भी  विद्यमान हैं ,इसमें एक समानता, जो सबसे महत्वपूर्ण हैं ,वह है ईश्वर प्रदत्त दोष ( काम ,क्रोध लोभ ,मोह ,अहंकार )जो सबमे विद्यमान है।                                                                                                       मित्रों ,हम सभी जब भी किसी क्रिया/कर्म को करते हैं तो उसे करते-करते यही दोष धीरे से हमारे कर्मो के साथ मिलकर हमारे कर्मो के परिणाम को कब बदल देते हैं वह हम समझ नही पाते। आप इस विषय को एक प्रसंग के माध्यम से समझिये। एक बार की बात हैं, सोमनाथ(काल्पनिक नाम ) नाम का व्यक्ति दीनपुर में रहता था ,सोमनाथ ईमानदार और शरीफ लोगों में जाना जाता था। सोमनाथ के पास दो गाय थी ,एक दिन सोमनाथ के गाय का चरा शाम के समय समाप्त हो गया। अँधेरा होना आरम्भ हो गया था ,सोमनाथ ने सोचा अब गाय को भूखा रखने से अच्छा है कि आज रात में पास वाले खेत से कुछ चारा चुपके से काट लाता हूँ। सोमनाथ रात में पड़ोस के खेत से रात में चारा चोरी से काट कर ले आता है और गाय को आधी रात को ही खिला देता है। सुबह जब गाय से दूध निकलता है तो दूध पहले से ज्याद होता है ,सोमनाथ बहुत खुस होता है। दो-चार दिन तक तो ठीक था पर एक सप्ताह भी नही बीता की फिर वही कहानी, सोमनाथ की लापरवाही से  फिर चारा नही,सोमनाथ फिर अपने पुराने तरीके आज़माता है और रात में ही चारा काट कर चुपके से गाय को चारा खिला देता है। धीरे-धीरे सोमनाथ की खुद के काम में लापरवाही बढ़ती जाती है और वह हर एक-दो दिन बाद किसी न किसी पड़ोसी के खेत में से रात को चारा काट लेता और गाय  को खिला देता। कुछ दिन मे ही पड़ोसियों को इस बात का एहसाश हो गया कि कोई उनका चार काट रहा है। पड़ोसियों ने अपने-अपने खेतों की रखावली आरम्भ कर दिए और एक दिन चारा काटते हुए सोमनाथ खेत में पकड़ा गया। सोमनाथ को उस दिन लोगों ने बहुत भला-बुरा कहा। सोमनाथ को उस दिन  बहुत शर्मिंदा होना पड़ा। उसी दिन गाँव के ही एक बूढ़े व्यक्ति ने सोमनाथ की ओर इशारा करते हुए कहा "जाओ सोमनाथ आज तुमने अपने चूनर में दाग लगा लिया"।                                                                       मित्रों, सोमनाथ के कर्मो में कोई कमी नही थी ,सोमनाथ कर्मठी और मेहनतक़श इंसान था ,पर गाय का मोह और दूध का लोभ ने सोमनाथ को दूसरे के खेत का चारा काटने को मजबूर कर दिया। सोमनाथ की आत्मा उसे दूसरे के खेतों से चारा चुराने से आहत थीं पर मन की करनी को रोक न सकी। सोमनाथ अपने पूरे जीवन में इतनी बेइज्जती कभी नही हुई थी। सोमनाथ ने थोड़ी सी लालच और आलस के चक्कर में जो खोया उसकी भरपाई वह अपने पूरे जीवन में कभी भी नही कर सकता था।                                                                                                                       मित्रों ,गाँव में एक कहावत कही जाती हैं "काजल की कोठरी में जाने पर कालिख़ लगना ही है "कहने और सुनने में अच्छा लगता है मगर उस कालिख़ से बचना बहुत है मुश्किल है। श्री कबीर साहब ने इस पर लिखा"चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोए। दूई पाटन के बीच में साबूत बचा न कोय।।                                                                                                                                                                                                                                                                                                          क्रमशः .......             

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