. क्या खोया -क्या पाया -1
मित्रों ,जीवन में हम सभी सामन्यतया पाने-खोने ,लेने-देने ,हानि-लाभ ,नफ़ा-नुकसान इत्यादि पर बार-बार विचार करते ही रहते हैं।इन सब विचारो में ही कई लोगो को हम सब ने मानसिक रूप से बीमार होते भी देखा होगा। पाने-खोने ,लेने-देने ,हानि-लाभ ,नफ़ा-नुकसान इत्यादि के चक्कर में आकर हमारे समाज में न जाने कितने अपराध हो जाया करते है जो कि नही होने चाहिए। हम सभी जानते है कि मानव जीवन में वैचारिक तौर पर धनात्मक और ऋणात्मक दोनों तरह के विचार विध्यमान हैं। ज्यो ही हम पाने की इच्छा लेकर आगे बढ़ते है खोने के विचार भी परेशान करना शुरू कर देते हैं, यह स्वभाविक भी है क्यों कि यदि हम किसी भी विषय-वस्तु को जिस समय पकड़ते है उसके पहले कुछ तो हमने छोड़ा होगा जिसको हमने पहले पकड़ा था ,हो सकता है कि आप ने कुछ भी न पकड़ा हो तो भी आप ने अपना विश्राम /आराम तो छोड़ा ही होगा। एक बात यही से निकल कर आती है जो हमे याद रखना चहिये ,पकड़ना-छोड़ना ,लेना -देना यह जीवन में सदैव लगा रहने वाला है जिस तरह हम कपड़े पहनते है और एक समय आने पर उसे उतार कर दूसरा धारण कर लेते है, इसी प्रकार से जन्म के समय हमने जीवन धारण किया था और एक समय आएगा कि हमारा जीवन समाप्त हो जायेगा। यह बात याद रखते हुए हमे जीवन जीने का प्रयास करना चहिये। मित्रों इससे जूड़ी एक और महत्वपूर्ण बात जिसे हम सभी को याद रखनी चाहिए कि जिस प्रकार से हम अपने कपड़े पहनते-उतारते है और ध्यान रखते है कि कही कोई दाग तो नही लगी, उसी तरह अपने जीवन में भी यह ख्याल सदैव बनाये रखना चाहिए कि पाने-खोने ,लेने-देने ,हानि-लाभ ,नफ़ा-नुकसान इत्यादि के चक्कर में पड़कर कहीं जीवन रूपी कपड़े में दाग न लग जाये। जीवन की इसी आपा-धापी को देखते हुए कबीर साहब ने कहा "बे दाग चुनरियाँ छोड़ गए",चुनरियाँ कबीर साहब शरीर रूपी कपड़े को कहते हैं। गहरा अर्थ ,क्या खूब कहने का अंदाज ,बात सामान्य ही हो रही है।एक छोटी सी वाक्य में कितना सारा भाव भर दिया। क्रमशः ....
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