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VARANSI

                                           

 

                                         वराणसी                                                                  

 

     मित्रों, जो लोग वराणसी के बारे में ज्यादा कुछ नही जानते है वह भी यह जानते है और मानते हैं कि भारत देश इस पृथ्वी के उस भू-खण्ड का नाम है, जिसकी मिट्टी में सजीव रूप में प्रगट होने वाले प्राणियों का जीवन,अति संवेदना और अनंत संभावना से परिपूर्ण होता है। भारत के इसी भू-खण्ड पर पूर्वोत्तर में प्रवाहित होने वाली पवित्र नदी गंगा के तट पर लाखों वर्ष पूर्व की मानव सभ्यता का वाहक एक नगर है, जिसे भारत का धार्मिक हृदयास्थल या काशी कहा जाता है। काशी, भारत की प्राचीन उत्कृष्ठ सभ्यता का द्योतक रहा है। काशी भारतीय संस्कृत का एक विशेष महत्ता से परिपूर्ण सभ्यता वाले शहरों से एक हैं, पौरणिक भारतीय जीवन शैली काशी में इस प्रकार रचा-बसा है कि जो लोग काशी के बारे थोड़ा भी जानते है वह यह बात जरुर जानते है कि काशी में मरने वालो को मुक्ति सहज ही प्राप्ति होती है।  




                                                                                                                                                             मित्रों ,हम में बहुत से लोग काशी की आद्यात्मिक ओज से परिचित होंगे पर कई लोग ऐसे भी होंगे जिन्हे हमारी काशी के बारे में  शायद  कुछ भी ज्ञान न हो। इस ब्लॉग के माध्यम से  मेरी  यही कोशिश है  कि काशी /वाराणसी की आध्यात्मिक गूढ़ता, भौगोलिक स्थिति एवं अन्य विषयों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी लोगों के पास पहुंचे।
                                                                                                                                               वाराणसी का धार्मिक महत्व
                                                                                                                                                                   मित्रों ,बाल्य अवस्था के बाद अर्थात सामान्य समझ होने पर हम सभी के मन में ,जीवन के सामान्य दिनचर्या में घटने वाली घटनाओं के कारण वाह्य एवं स्थूल जगत को जानने और समझने की जितनी जिज्ञासा होती है उतनी और उसी प्रकार की जिज्ञासा आन्तरिक जगत को / स्वम् को समझने और जानने की होती है। वाह्य जगत को जानने और समझने के लिए जिस प्रकार से हम किसी विद्यालय या शिक्षण संस्थाओं का सहारा लेते हैं उसी प्रकार से आंतरिक जगत को भी जानने और समझने के लिए कुछ विशेष स्थान एवं माहौल की आवश्कता होती है।
                 मित्रों ,वाह्य जगत/स्थूल जगत /दृश्य जगत की शिक्षा या अध्ययन के लिए जिस प्रकार से हमें बड़े-बड़े स्कूल ,विद्यालय ,और विश्वविद्यालय इत्यादि में स्थान सुरक्षित करते है , उसी प्रकार से आन्तरिक जगत/सूक्ष्म जगत /अदृश्य जगत के बारे में जानने और समझने के लिए पूर्व के समय में हिन्दू धर्म या सत्य सनातन धर्म के लोगों ने विशेष स्थान स्थापित किये थे। उसमें से एक पुन्य स्थान वाराणसी या काशी भी हैं। वाराणसी हजारों वर्ष पूर्व  जब क़स्बे / मुहल्ले के रूप में था तब इसका नाम काशी ही था और आज भी  वाराणसी में  काशीपुरा   के नाम से वाराणसी के बीच शहर में एक मुहल्ला मौज़ूद है।
                 मित्रों ,आप सभी जानते है कि भारत (जो हिंदुस्तान के नाम से भी जाना जाता रहा है) और भारतीयता में स्वतः से अंकुरित एवं विकसित होने वाले सत्य सनातन धर्म में श्रेष्ठ मानव सभ्यता पर श्रेष्ठ लोगों द्वारा लगातार शोध कार्य सम्पादित किये जाते रहे है,उसी पृष्ठभूमि में मानव सभ्यता के प्रारम्भिक काल में कुछ शोधकर्ताओं द्वारा यह शोध किया गया कि हिमालय से निकलने वाली पवित्र नदी गंगा का प्रवाह दक्षिण और पूर्व दिशा की ओर है तथा शोध कर्ताओं ने अपने शोध में यह भी पाया कि गंगा नदी के प्रवाह में ऐसे मार्ग भी है जहाँ नदी अपने स्वभाविक प्रवाह की दिशा एवं नियम को भंग कर दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित हो रही है जो कि भोगोलिक सिद्धांत के बिलकुल विपरीत है और उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि जहाँ नदी का प्रवाह इस तरह का होता है उसके अन्तिम छोर अर्थात नदी फिर जिस स्थान से अपने प्राकृतिक रूप में आती है अर्थात उसका प्रवाह अपने स्वाभाविक प्रवाह पूर्व दिशा की ओर हो जाता है, उसके पहले उसके प्रवाह की गति धीमी और नियंत्रित होती है इस कारण से उस स्थान पर आपदा आने कि संभावना न के बराबर है चुकि पूर्व समय में आपदा प्रवन्धन आज की अपेच्क्ष ज्यादा चुनौती पूर्ण था और जीवन के लिए जल प्रवन्धन भी एक प्रमुख आवश्यकताओं में एक था, इसलिए किसी नदी के किनारे ऐसे स्थान की खोज करना एक महत्वपूर्ण शोध का विषय था कारण की मानव सभ्यता के आरम्भ में आपदाओं से मानव सभ्यता को सुरक्षित रखना ही अपने आप में बहुत बड़े विकास को अवसर देना था आज मानव सभ्यता जिस भी विकसित अवस्था में हैं उसमें इन आरम्भिक खोजों का महत्वपूर्ण योगदान है। अतः ऐसे स्थान पर उस समय शोधकर्ताओं ने समाज के श्रेष्ठ लोगों को बसने और रहने की व्यवस्था की ताकि सामान्य मानव सभ्यता के नष्ट हो जाने पर भी पुनः नई और श्रेष्ठ सभ्यता की नींव रखी जा सके। यह एक महत्वपूर्ण कारण है कि भारतीय सभ्यता के आरम्भिक विकास काल से ही सत्य सनातन धर्म के श्रेष्ठ एवं विकसित मानसिकता के लोग यहाँ निवास करते रहे है इसी कारण से काशी /वाराणसी को पौराणिक मानव सभ्यता का वाहक कहा जाता है।
                    मित्रों, मानव सभ्यता के इतिहास में अनेकों बार ऐसा हुआ है कि प्रलय जैसी स्थिति आई और मानव सभ्यता कई बार मानो उजड़ सी गई परन्तु काशी /वाराणसी की भौगोलिक स्थिति एवं सनातन धर्म की विशेषताओं के कारण इसके मूल सभ्यता का नाश कभी भी नही हुआ ,यही कारण है कि सामान्य लोगों द्वारा यह मान लिया गया कि काशी की रक्षा भगवान शिव स्वयं करते है।

पौराणिक मान्यता

                   पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव अपनी तपस्या के उपरान्त अपना गृहस्थ जीवन काशी में ही गुज़रते रहे और फिर जब भी तप करना होता तो कैलाश चले जाते। इस कारण से भी हिन्दू शिव भक्तों के लिए काशी एक पवित्र और श्रद्धा पूर्ण स्थान है।

वाराणसी जीवन्त नगर

                   मित्रों ,वाराणसी पूरी दुनियाँ में एक जीवन्त नगर के रूप में जाना जाता है ,इसका कारण तर्क शास्त्री बताते है कि वाराणसी में दिन और रात ,बारह महीने अर्थात हर समय कोई न कोई आत्मज्ञानी आवश्य उपस्थित रहता है इस तर्क को निराधार नही कहा जा सकता क्योंकि आप सभी ने इतिहास में पढ़ा होगा कि पन्द्रवीं सदी में जब पूरा भारत मुग़ल एवं तुर्क आक्रमणकारियों से त्राहिमाम कर रहा था उस समय वाराणसी /काशी ही एक ऐसा स्थान था जहाँ बिना किसी भय संशय के संत शिरोमणि श्री रामानन्द ,कबीर ,तुलसी ,रैदास और बहुतेरे महात्मा अपने तप और आत्मज्ञान के माध्यम से सत्य सनातन धर्म का अलख जगाये रखे। हम सोच सकते है कि यदि उन विपरीत परिथितियों में यदि सनातनी धर्म के रखवाले काशी में धर्म ध्वजा को उठाए रख सकते है तो आज भी यह संभव है।
                 मित्रों ,पंद्रहवीं सदी और उसके बाद का लगभग तीन सौ वर्ष का समय भारत के सत्यसनातन धर्मियों के लिए मानो घोर संकट का समय था। उस समय मुग़ल शासकों ने सत्य सनातन धर्म की बुनियाद पर आक्रमण किया मगर सत्य सनातन धर्म की बुनियाद इतनी मजबूत रही कि अधर्मियों के लाखों प्रहार के वावजूद भी हमारे सत्य सनातन धर्म की एक ईट भी न निकाल सके ,उसमें महत्वपूर्ण भूमिका हमारे वाराणसी के संतों ,साधुओं त्यागियों और उनके तपोबल का रहा जिनके प्रभाव से जन सामान्य अपने धार्मिक संस्कारों के पथ पर निर्भीक रूप से चलता रहा और आज वह आप के सामने पुनः फलता-फूलता नज़र आ रहा हैं।

वाराणसी की जीवन शैली


                     मित्रों ,दुनियाँ में बहुत से व्यवस्थित, सुन्दर ,एवं पूर्ण रूप से सुनियोजित शहर आप ने देखा होगा। आप ने दुनियाँ के कई शहर आप के मन मोह लिए होंगे। अद्भुत वास्तुकला और बहुत से सुन्दर कृतियाँ आप सब ने देखें होंगे। श्रेष्ठ जीवन शैली का भी आप सब ने अनुभव किया होगा परन्तु मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि वाराणसी जैसी जीवन शैली आप को सायद ही कहीं मिली हो। हमारे जो मित्र वाराणसी आ चुके हैं वह तो जानते होंगे पर जो लोग अब तक नहीं आये है आकर महसूस करेंगे तो उनको यह आभाष होगा कि वास्तव में वह एक आध्यात्मिक नगर में है। यहाँ चाय-पान की दुकान से लेकर विश्वविद्यालय तक आप को आध्यात्मिकता की सुगंध का एहसास होगा। यहाँ के मूल जीवन शैली में आप को अनायास ही एक वैराग दिखाई देगा। वाराणसी में निवास करने वाले यहाँ के मूल निवासियों में आज भी संचय करने की आदत नही है यहाँ के जीवन शैली में रचे बसे लोग कल की चिंता में नही पाए जाते। यहाँ के मूल निवासी आज भी भगवान शिव की अड़भंगी स्वभाव के अनुरूप ही जीवन निर्वहन करने पर विश्वास करते हैं। वाराणसी के आबोहवा में आध्यात्मिकता इस कदर घुली हुई है कि आप को बातों-बातों में भागवत चर्चा कब आरम्भ हो गई आपको पता ही नही चलेगा। इसी कारण लोगों द्वारा कहा जाता है कि वाराणसी के कण-कण में शिव का निवास करते है। वाराणसी का आध्यात्मिक आनंद और भी कई गुना तब बढ़ जाता है जब आप श्री गंगा जी के घाटों पर होते हैं। श्री गंगा जी के घाटों पर सुबह-शाम पहुँचने वाले धार्मिक लोगों को देख कर आप स्वयं को आध्यात्मिक प्रवाह में बहने से नही रोक पाएंगे।


क्रमशः

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