स्वस्थ होने का अर्थ
दोस्तों स्वस्थ होने को हम सभी अंग्रेजी में हैल्थी होना ही समझते हैं ,इसका मतलब हम सभी पुष्ट शरीर का होना अर्थात सशरीर हाथ-पैर से मजबूत होना ही आज तक समझते हैं, परन्तु मित्रों हिन्दी की भाषा में स्वस्थ होना मतलब बहुत ही व्यापक भाव लिए हुए हैं। आप विचार करें तो ज़्यादा वेहतर समझ पाएंगे कि स्वस्थ शब्द स्व +अस्थ से मिल कर बना है और हम में से जो लोग भी हिन्दी में संधि पढ़े होंगे उनको यह जानकारी होगी। पिछले लेखन में मैंने स्व शब्द पर लिखा भी था पर फिर से इसका जिक्र करना उचित समझता हूँ। मित्रों यह स्व शब्द सबसे पहले गायत्री मंत्र में प्रयोग में आया हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है अपने या स्वयं अर्थात शरीर के अंदर से बाहर जो आपका अपना हो। मित्रों ,हम एक प्रश्न अपने आप से करते है ,प्रश्न है:-"मै कौन हूँ?" यह प्रश्न आप को किसी और से नही स्वयं अपने से पूछना है। हमारे बहुत से जानने वाले है जिन्होंने एकांत में बैठ कर स्वयं से यह पूछने का प्रयास किया है और उन्हें अपने में आत्म तत्व होने का एहशास भी हुआ है। अतः आप की अपनी अंतरात्मा,जिसके बिना आप के शरीर का कोई अस्तित्व ही नही हैं ,वह स्व जिसने आप के शरीर का निर्माण किया ,जिसने आपको धरा पर अस्तित्व में आने पर सभी प्रकार के अनभवों की अनभूति करने की ऊर्जा प्रदान किया, वह स्व। वह स्व जो ऊर्जा स्वरूप में हर समय शरीर को चलायमान रखता है, वह स्व जिसके होने से प्राणी मात्र का जगत में होना होता है और न होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है वह स्व जो आप का अपना प्राण या आप की अपनी अंतरात्मा।वह स्व जो आप के शरीर में संवेदना भरता है। अब हम सब ने स्व का अर्थ तो समझ लिया होगा ।
मित्रों , अब हम अस्थ का अर्थ /मतलब समझने की कोशिश करते है। अस्थ का अर्थ संस्कृत में रुकना ,ठहरना ,निवास करना ,विश्राम करना ,या डुबने होता हैं। अब हम दोनों को जोड़ते हैं, आप स्वस्थ होने का अर्थ समझने का प्रयास करें तो अर्थ आता है स्व में निवास करना ,अपने अंतरात्मा में डूब जाना, स्वयं में ठहर जाना। आप सोच रहे होंगे कि यह क्या बात हो रही है, परन्तु दोस्तों अर्थ यही है। आप इस अर्थ को अपने जीवन में उतार कर देखें, आप को अनुभव होगा कि जब भी आप अपने अन्दर स्व के बारे में केवल महशूस भर करें ,आप कुछ समय के लिए ही सही पर अपने सारी मुश्किलों और समस्याओं को भूल जाएंगे और आप को जान कर हैरानी होगी कि शरीर में कुछ मुश्किल या समस्या होना व उसका बार-बार ध्यान जाना ही तो बीमारी हैं ,रोग हैं अर्थात रोग वही है जो आप को किसी भी स्थिति में रुकने नही देता ,विश्राम नही करने देता।
मित्रों ,आप को कभी ईश्वर न करें कि कभी किसी प्रकार का दर्द हो लेकिन अगर किसी को कभी कोई दर्द हो जाएं। उसी समय अचानक कोई जरुरी काम आ जाये तो वह दर्द कुछ देर के लिए महशुस होने के बजाए भूल जाता है। यह जो उपाय दर्द निवारक मलहम का है वह वैसे ही है जैसे ही दर्द वाले जगह पर मलहम लगते है एक जलन महशुस होता है, मतलब एक नया परेशानी, अब पुरानी समस्या पर ध्यान कम अर्थात दर्द कम हो गया। मित्रों ,उसी प्रकार से आप देखेंगे की यदि हमारी कोई कीमती वस्तु खो जाए तो हमारे मन में बार-बार उसी पर ध्यान जाता है ,मगर उसी समय आप को पता चले की उससे भी कीमती कोई वस्तु नही मिल रही है तो हमारी सोच से पिछली कम कीमत की वस्तु का विचार मिट जाता है। इसी प्रकार हमारे जीवन में हमारी अंतरात्मा ही हमारे जीवन का आधार है ,उससे ज्याद कीमती और क्या हो सकता है वह प्राण तत्व ही तो हमारा जीवन है। उसके ध्यान मात्र से दर्द ,दुःख ,क्लेस ,संताप ,विषाद स्वयं मिट जाते है। दर्द ,दुःख ,क्लेस ,संताप और विषाद इत्यादि ही तो हमें बीमार बनाते है।
मित्रों ,इसको आप दूसरे तरीके से भी समझें ,हमारी अंतर आत्मा ही हमारे जीवन में मुख्य ऊर्जा का स्रोत है और जब अपने मुख्य ऊर्जा स्रोत पर ध्यान देते है तो स्वतः अन्य किसी परेशानी ,समस्या पर ध्यान नही जाता। परेशानी, दुःख ,समस्या कब नही रही और कब नही रहेगी लेकिन जैसे हम बचपन में चोट लगने पर रोते हुए माँ के पास भाग जाते थे और वहाँ गोद में पहुँचते ही हमारे सभी दुःख मिट जाते थे उसी प्रकार जब हम अपनी अंतर आत्मा का ध्यान करते है तो हम अपने को स्वस्थ महशूस करते है। अतः हम कह सकते है स्व में अस्त होना ही स्वस्थ होना है। मृत्युंजय
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