खुद से लडिये और आगे बढिये (भाग-2 ) पिछले ब्लाग में आप ने 'खुद से लडिये और आगे बढिये ''का कुछ भाव तो जरूर समझा होगा,अब उसी विषय में आगे चलते हैं ,हम सब ने यह महशुस किया है की जीवन के इस आपा-धापी में हमें काम ,क्रोध,लोभ, मोह, और अहंकार के कारण तमाम बात-विवाद का सामना करना पड़ता है,जो स्वाभाविक लगता है परन्तु सच में यह अस्वभाविक घटनाएं हैं। अब हम विचार करें तो पाएंगे कि बिना काम ,क्रोध,लोभ, मोह, और अहंकार के जीवन की परिकल्पना नहीं की जा सकता ,क्यों कि अगर काम (वासना )जीवन में न हो तो हमें विवाह से क्या प्रयोजन ,इसी प्रकार यदि पत्नी और बच्चे न हो तो मोह किसका और लोभ ना हो ,मतलब हमें किसी भी चीज़ की जरुरत ही नही ,तो फिर काहें का जीवन ,इस तरह तो जीवन का कोई अर्थ ही नहीं। इसका मतलब बिना काम ,क्रोध,लोभ, मोह, और अहंकार के बिना सामान्य मानव जीवन असंभव है। अब कोई यह कहता है कि क्रोध नही करना चाहिए तो यह असंभव है मगर हाँ क्रोध को नियंत्रण में होना आवश्यक है ,इसी प्रकार हमें अपने जीवन में अपने मूल अवगुणों (काम ,क्रोध,लोभ, मोह, और अहंकार) को नियंत्रित रखने के लिए खुद से लड़ना चाहिए। अंततः बिना खुद को नियत्रित किए अर्थात बिना खुद पर अनुशासन के आप किसी और पर शासन के काबिल नही हो सकते। ........ क्रमशः आपका मृत्युंजय मो. न. 9936351423
विचारों की शक्ति विचारों की शक्ति मित्रों ,इस लेखन को पढ़ने पर सबसे पहले हमारे मन में प्रश्न आता हैं कि विचार हम किसे कहते हैं ? मित्रों, आप सब ने महसूस किया होगा कि हमारा मस्तिष्क निरंतर किसी न किसी परिकल्पना में लगा रहता है या हम कह सकते है कि हम सभी के मनस पटल पर निरंतर कुछ ख्याली तरंगे उठती रहती हैं। हमारे मन में समय ,परिस्थिति और आवश्यकता के अनुरूप कुछ न कुछ ख़्याल हर समय चलते रहते है जिसमे से बहुत से ख़्याल अर्थात सोच समय, परिस्थिति और आवश्यकताओ के साथ ही समाप्त हो जाते है परन्तु कुछ सोच हमारे मन मस्तिष्क में बने रह जाते है और उन सोचों का हमारे मन पर इतना गहरा प्रभाव होता है कि हमारा मस्तिष्क उन्ही को आधार बनाकर जीवन के छोटे-बड़े फैसले लेने लगता है उन्हे...
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