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जीवन का कठोर सत्य

                                                                                                                                                                                                                          

                                          जीवन का कठोर सत्य    (भाग - 3)                                                                                                                                                                                                 6. जीवन में हमें मनुष्य  होने के नाते बहुत सी उपलब्धियाँ /गुण हासिल है। तो साथ साथ- साथ बहुत सी कमियाँ /दोष भी है। मनुष्य जीवन को प्रारंभ से अंत तक निरीक्षण करने पर यह महसूस होता है की बचपन में लेकर बुढ़ापे तक मनुष्य सिखता ही रहता है। जीवन के आरम्भ में अति सामान्य कलाओ को और  जैसे -जैसे उम्र बढ़ती है वैसे -वैसे कठीन कलाओं को ग्रहण करता हुआ जीवन के अंत में मृत्यु को सीखता है।  थोड़ी अद्भुत बात है अन्य सभी कलाओं को तो वह सबको सिखा और बता सकता है परन्तु मृत्यु की जो कला है वह सीख तो जाता है पर किसी और को बता नही पाता है क्यों कि वह उसके लिए क़ाबिल ही नही रह जाता। अब अगर यह कहा जाए कि कई मर कर वापस जिन्दा हो जाए तो वह किसी को मृत्यु कैसे होती है बातए पर कोई मर कर जिन्दा ही नही होता। वास्तव में विचार किया जाए तो पता चलता है कि भारत के इतिहास में कई बिद्वान ,संत और मनिषियों ने मृत्यु को महसुस किया था। उन्होंने ने यह सत्यापित किया है कि मृत्यु जीवन का ही अंतिम पड़ाव है जो हमारे आज और अभी के कर्मो से निर्धारित होता है। भारत के महात्माओ और मनुष्यता पर खोज कर ने वाले कई लोगो ने मृत्यु को सुगम्य बनाने की विधि भी ईजाद की है। इस सब के बावजूद मनुष्य के मृत्यु को कौन कहे ,जीवन ही कठिन हुआ जा रहा है, जब की अगर हमारा जीवन आसान नही हुआ तो निश्चित रूप से जानिए की मृत्यु आसान नही होगी।                                                                              अतः हम सभी लोगो को चाहिए कि जीवन को आसान बनाए ताकि  मृत्यु भी आसान प्राप्त हो सके। ..... क्रमशः                                    

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