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जीवन का कठोर सत्य (भाग - 2)

                                                                                                                                                                                          जीवन का कठोर सत्य (भाग - 2)                                                                                                                                                                                                         5. हम सब अपने जीवन में मित्र बनाते है और हम सब ने समाज में सुना/ देखा है  कि  सभी के कुछ शत्रु भी होते है। आपने सायद कभी विचार किया हो की लगभग 99 % शत्रु पहले हमारे मित्र थे या परिचित थे परन्तु ऐसा क्या हो जाता है की एक मित्र, शत्रु बन जाता है। मैं  बहुत ही अस्पष्ट कहूँगा  कि जरूर धोखा हुआ होगा या सम्बंधो में कही न कही कुछ असत्य /झूठी बात आई होगी ,कुछ न कुछ गलत महसूस हुआ होगा।  जिसको लेकर दो मित्र शत्रु बन गए। यह बात जन -सामन्य को अच्छी तरह से समझ में आती है परन्तु जो बात मै आप से कहना चाहता हु वह इसी विषय से जुड़ा है वह यह है कि झूठ/असत्य किसी भी मनुष्य को पसंद नहीं है, कारण  कि हर प्राणी की उत्त्पत्ति एक सत्य से  हुई है और वह सत्य आत्मा है और वह आत्मा सदा-सर्वदा सत्य को ही स्वीकार करती है इसलिए व्यक्ति जिस पर ज्यादा विश्वास करता है वह अगर लेस मात्र भी असत्य /झूठ का सहारा लेता प्रतीत होता है तो हमें लगता है कि हमारे साथ बहुत बड़ा धोखा हो गया और  हम सम्बन्ध तोड़ लेते है।                                                                                                                         विषय को और भी गहराई से विचार किया जाये तो बात समझ में आये। इस पूरे पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी व्यक्तियो में लगभग यही गुण -धर्म पाए जाते है कि यदि किसी ने उसके साथ असत्य /झूठा व्योहार कर दिया तो फिर मुसीबत हो गई, फिर भी जो व्यक्ति  किसी भी तरह अपने स्वयं के आत्म तत्व से परिचित हो गया है उसके लिए इस संसार में ना  तो कोई मित्र है ना ही कोई शत्रु।इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति स्वयं में सत्य और असत्य को नही जनता वह खुद में ही असंतुष्ट है और खुद पर ही विश्वास नही कर पाता। ऐसे में उसका खुद का मानसिक स्थिति पहले से ही किसी असत्य को स्वीकार करने की नही होती है परन्तु आत्म ज्ञानी व्यक्ति यह अनुभव ही नहीं बल्कि विश्वास भी रखता है कि आत्मा के सिवाय दुनियाँ में कुछ भी सत्य नही है। इसलिए आत्म ज्ञानी, आत्म तत्व को छोड़ कर किसी सत्य ,असत्य के द्वंद में नही पड़ता और वह हर सत्य और असत्य को पहचान लेता है। एक आत्म ज्ञानी  यह निश्चित रुप से जनता है कि समय के साथ आत्मा को छोड़ कोई भी सत्य टिक नही सकता।                                                                           अतः मै आप से कहूँगा  की आप आत्म ज्ञानी बनने का प्रयास करें।                                                                                                                                                                                                                                     

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